श्री गुरुचरित्र अध्याय १८ — संपूर्ण पाठ
गुरुचरित्र क्या है और इसका महत्व
श्री गुरुचरित्र दत्त संप्रदाय का एक अत्यंत पूजनीय ग्रंथ है, जिसमें भगवान दत्तात्रेय के अवतार माने जाने वाले श्रीपाद श्रीवल्लभ और श्री नृसिंह सरस्वती के जीवन, उपदेशों और चमत्कारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। आज भी लाखों श्रद्धालु गुरुचरित्र का नियमित पाठ करते हैं और इसे गुरु कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम मानते हैं। उपलब्ध धार्मिक स्रोतों के अनुसार गुरुचरित्र में कुल 53 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय का अपना विशिष्ट महत्व माना जाता है। अध्याय 18 विशेष रूप से दारिद्र्य निवारण, आर्थिक उन्नति और गुरु कृपा से जुड़ा माना जाता है।
जब कोई व्यक्ति जीवन की कठिन परिस्थितियों से घिर जाता है, तब उसे केवल धन की आवश्यकता नहीं होती बल्कि सही मार्गदर्शन की भी जरूरत होती है। गुरुचरित्र का यही संदेश है कि वास्तविक परिवर्तन केवल बाहरी साधनों से नहीं बल्कि गुरु के आशीर्वाद और आत्मविश्वास से आता है। यही कारण है कि अध्याय 18 को विशेष श्रद्धा से पढ़ा जाता है।
श्री नृसिंह सरस्वती का दिव्य चरित्र
श्री नृसिंह सरस्वती को भगवान दत्तात्रेय का द्वितीय अवतार माना जाता है। उन्होंने समाज को धर्म, सदाचार, भक्ति और सेवा का मार्ग दिखाया। उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएँ गुरुचरित्र में वर्णित हैं। अध्याय 18 भी ऐसी ही एक प्रेरणादायक घटना को प्रस्तुत करता है जिसमें एक निर्धन ब्राह्मण का जीवन पूरी तरह बदल जाता है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 का परिचय
गुरुचरित्र अध्याय 18 की कथा महाराष्ट्र के एक पवित्र क्षेत्र अमरापुर से जुड़ी हुई है, जो कृष्णा और पंचगंगा नदियों के संगम के निकट स्थित माना जाता है। इस अध्याय में एक अत्यंत गरीब लेकिन धर्मनिष्ठ ब्राह्मण का वर्णन मिलता है। वह ब्राह्मण अपनी पत्नी और परिवार के साथ अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके पास संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं था, फिर भी उसने कभी धर्म और सदाचार का मार्ग नहीं छोड़ा।
यह अध्याय केवल चमत्कार की कहानी नहीं है बल्कि यह बताता है कि किस प्रकार ईश्वर और गुरु उन लोगों की सहायता करते हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना विश्वास बनाए रखते हैं। कहानी में गुरु का हस्तक्षेप अचानक दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वह ब्राह्मण की वर्षों की श्रद्धा और धैर्य का परिणाम था।
अध्याय 18 की मुख्य कथा
गरीब ब्राह्मण और गुरु की कृपा
कथा के अनुसार एक गरीब ब्राह्मण प्रतिदिन भिक्षा मांगकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसके घर के बाहर एक साधारण सी बेल लगी हुई थी जो उसके परिवार के लिए भोजन का एक छोटा सा सहारा थी। एक दिन श्री नृसिंह सरस्वती उसके घर आए और बिना किसी स्पष्ट कारण के उस बेल को जड़ सहित उखाड़ दिया। यह देखकर ब्राह्मण और उसकी पत्नी अत्यंत दुखी हो गए क्योंकि वही उनके भोजन का एकमात्र साधन था।
पहली नजर में यह घटना अन्याय जैसी प्रतीत होती है। आखिर कोई संत किसी गरीब व्यक्ति की सहायता करने के बजाय उसका सहारा क्यों छीन लेगा? यही वह बिंदु है जहाँ अध्याय 18 का वास्तविक संदेश छिपा हुआ है। गुरु हमेशा तत्काल सुख नहीं देते; वे दीर्घकालिक कल्याण की व्यवस्था करते हैं।
अमरापुर और पवित्र संगम का आध्यात्मिक महत्व
अमरापुर का उल्लेख गुरुचरित्र में एक अत्यंत पवित्र स्थान के रूप में मिलता है। कृष्णा और पंचगंगा का संगम भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। संगम केवल दो नदियों का मिलन नहीं होता, बल्कि वह जीवन और चेतना के एकीकरण का प्रतीक माना जाता है।
गुरुचरित्र में वर्णित घटनाएँ अक्सर ऐसे तीर्थस्थलों पर घटित होती हैं जहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष प्रभाव माना जाता है। अमरापुर की यह कथा भी हमें बताती है कि जब मनुष्य श्रद्धा, सेवा और भक्ति के साथ जीवन जीता है, तब साधारण स्थान भी आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र बन जाते हैं। आज भी अनेक श्रद्धालु इस स्थान को गुरु कृपा का प्रतीक मानते हैं और वहाँ दर्शन के लिए जाते हैं।
गरीब ब्राह्मण की जीवन परिस्थितियाँ
गरीबी केवल धन की कमी नहीं होती; यह मानसिक और सामाजिक संघर्ष भी लेकर आती है। अध्याय 18 का ब्राह्मण इन सभी चुनौतियों का सामना कर रहा था। उसके पास न तो खेती थी, न व्यापार और न ही कोई बड़ा सहारा। इसके बावजूद उसने कभी अधर्म का रास्ता नहीं चुना। वह प्रतिदिन भिक्षा से प्राप्त भोजन में संतोष रखता था और ईश्वर का स्मरण करता था।
आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी समस्याओं में निराश हो जाते हैं, यह कथा धैर्य और संतोष का अनमोल उदाहरण प्रस्तुत करती है। ब्राह्मण का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, व्यक्ति अपने मूल्यों और विश्वास को बनाए रख सकता है। यही गुण अंततः उसे गुरु कृपा का पात्र बनाते हैं।
कठिन परिश्रम और संतोष का जीवन
संतोष का अर्थ आलस्य नहीं होता। ब्राह्मण लगातार प्रयास करता था और ईमानदारी से जीवन जीता था। उसकी गरीबी उसके चरित्र को कमजोर नहीं कर सकी। यही कारण है कि अध्याय 18 में उसे केवल आर्थिक लाभ नहीं मिलता बल्कि सम्मान और स्थायी सुख भी प्राप्त होता है।
श्री गुरु का आगमन और चमत्कार
कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब श्री नृसिंह सरस्वती ब्राह्मण के घर पहुंचते हैं। गुरु उस बेल को उखाड़ देते हैं जिसे परिवार अपना सहारा मानता था। सामान्य व्यक्ति के लिए यह निर्णय समझना कठिन है। लेकिन गुरु का दृष्टिकोण हमेशा व्यापक होता है।
घेवड़े की बेल उखाड़ने की घटना
जब बेल को पूरी तरह उखाड़ा गया तो उसके नीचे छिपा हुआ धन प्राप्त हुआ। वर्षों से जमीन के भीतर दबा यह धन किसी को दिखाई नहीं दिया था। गुरु ने केवल एक बेल नहीं हटाई, बल्कि उस बाधा को हटाया जो ब्राह्मण की समृद्धि के मार्ग में खड़ी थी। इस घटना के बाद उसका दारिद्र्य समाप्त हो गया और उसका जीवन बदल गया।
यह घटना प्रतीकात्मक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार हम जीवन में किसी छोटी सुविधा को पकड़कर बैठे रहते हैं जबकि ईश्वर हमारे लिए कहीं बड़ा अवसर तैयार कर रहे होते हैं। गुरु उस अवसर को पहचानते हैं और सही समय पर हमारे सामने लाते हैं।
छिपे हुए धन का रहस्य
कथा में प्राप्त धन केवल आर्थिक संपत्ति का प्रतीक नहीं है। यह मनुष्य के भीतर छिपी हुई संभावनाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। गुरु हमें बताते हैं कि हमारे जीवन में कई ऐसे खजाने मौजूद हैं जिन्हें हम पहचान नहीं पाते। कभी वह प्रतिभा के रूप में होते हैं, कभी अवसर के रूप में और कभी आध्यात्मिक शक्ति के रूप में।
गुरु की दूरदृष्टि का प्रमाण
गुरु की विशेषता यही है कि वे वह देख सकते हैं जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देता। अध्याय 18 हमें सिखाता है कि गुरु पर विश्वास रखने से जीवन की दिशा बदल सकती है। जब व्यक्ति अपनी सीमित सोच से ऊपर उठता है, तभी वास्तविक प्रगति संभव होती है।
अध्याय 18 से मिलने वाली आध्यात्मिक शिक्षाएँ
| शिक्षा | अर्थ |
|---|---|
| गुरु पर विश्वास | हर घटना के पीछे कल्याण छिपा हो सकता है |
| धैर्य | कठिन समय स्थायी नहीं होता |
| संतोष | परिस्थितियों से बड़ा चरित्र होता है |
| श्रद्धा | ईश्वर की कृपा का आधार |
| कर्म | निरंतर प्रयास सफलता का मार्ग बनाता है |
गुरु पर पूर्ण विश्वास का महत्व
अध्याय 18 का सबसे बड़ा संदेश यही है कि गुरु के निर्णय हमेशा कल्याणकारी होते हैं। कई बार उनकी कार्यप्रणाली हमें समझ नहीं आती, लेकिन समय के साथ उसका उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है।
कर्म, श्रद्धा और धैर्य का संदेश
सिर्फ प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति को कर्म भी करना पड़ता है। ब्राह्मण ने अपने जीवन में ईमानदारी और परिश्रम नहीं छोड़ा था। उसकी श्रद्धा और कर्म दोनों ने मिलकर उसे गुरु कृपा का पात्र बनाया।
आर्थिक संकट दूर करने में अध्याय 18 की मान्यता
दत्त संप्रदाय में अध्याय 18 को विशेष रूप से दारिद्र्य निवारण और आर्थिक समस्याओं के समाधान से जोड़ा जाता है। कई धार्मिक स्रोत इसे आर्थिक संकट दूर करने के लिए प्रभावी अध्याय मानते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि नियमित पाठ से मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच विकसित होती है, जो आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक आधार बनती है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि अध्याय 18 कोई जादुई उपाय नहीं सिखाता। इसका वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को आशा, विश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करना है। जब मनुष्य निराशा से बाहर निकलता है, तभी वह नए अवसरों को पहचान पाता है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 पाठ के लाभ
मानसिक शांति और आत्मविश्वास
नियमित पाठ मन को स्थिर करने में सहायता करता है। जब व्यक्ति कथा के संदेशों पर चिंतन करता है, तो उसे जीवन की समस्याएँ पहले जितनी भयावह नहीं लगतीं। उसके भीतर यह विश्वास उत्पन्न होता है कि कठिनाइयाँ अस्थायी हैं और समाधान संभव है।
परिवार में सुख-समृद्धि
अनेक श्रद्धालु मानते हैं कि अध्याय 18 का पाठ परिवार में सकारात्मक ऊर्जा लाता है। इससे पारिवारिक संबंधों में मधुरता बढ़ती है और तनाव कम होता है। चाहे इसे आध्यात्मिक प्रभाव माना जाए या मनोवैज्ञानिक, इसका सकारात्मक परिणाम अनुभव किया जाता है।
आधुनिक जीवन में अध्याय 18 की प्रासंगिकता
आज का व्यक्ति आर्थिक दबाव, नौकरी की अस्थिरता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे समय में गुरुचरित्र अध्याय 18 का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि असली शक्ति बाहरींगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि असली शक्ति बाहरी संसाधनों में नहीं बल्कि आंतरिक विश्वास में होती है। जिस प्रकार गरीब ब्राह्मण ने धैर्य नहीं छोड़ा, उसी प्रकार आधुनिक व्यक्ति भी चुनौतियों के बीच अवसर खोज सकता है।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में दिखाई देने वाली हानि कभी-कभी बड़े लाभ का द्वार खोलती है। यदि हम हर कठिनाई को केवल समस्या के रूप में देखेंगे तो निराशा बढ़ेगी। लेकिन यदि उसे सीख और अवसर के रूप में देखेंगे तो विकास संभव होगा।
निष्कर्ष
गुरुचरित्र अध्याय 18 केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि जीवन प्रबंधन का अद्भुत सूत्र है। गरीब ब्राह्मण और गुरु की कृपा की यह कहानी हमें विश्वास, धैर्य, संतोष और समर्पण का महत्व समझाती है। अध्याय का मूल संदेश यह है कि गुरु हमारे जीवन में छिपे हुए खजानों को पहचानने में सहायता करते हैं। कभी-कभी जो घटना हमें नुकसान लगती है, वही भविष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि का कारण बन सकती है। यही कारण है कि आज भी लाखों श्रद्धालु इस अध्याय का पाठ श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं।
FAQs
1. गुरुचरित्र अध्याय 18 किस विषय पर आधारित है?
यह अध्याय एक गरीब ब्राह्मण के दारिद्र्य निवारण और श्री नृसिंह सरस्वती की कृपा की कथा पर आधारित है।
2. अध्याय 18 को विशेष क्यों माना जाता है?
इसे आर्थिक संा से जोड़कर देखा जाता है
3. क्या अध्याय 18 का नियमित पाठ लाभदायक माना जाता है?
दत्त परंपरा के श्रद्धालु इसे मानसिक शांति,के लिए लाभदायक मानते हैं।
4. गरीब ब्राह्मण को धन कैसे प्राप्त हुआ?
श्री गुरु द्वारा बेल उखाड़ने के बाद उसके दारिद्र्य समाप्त हो गया।
5. आधुनिक जीवन में इस अध्याय की क्या उपयोगिता है?
यह अध्याय धैर्य, सकारात्मक सोच, गुरु विश्वास और कठिन परिस्थितियों में आशा बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
॥ श्रीगुरुचरित्र अध्याय १८ ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः । श्रीगुरुभ्यो नमः ॥
॥१॥
जय जया सिद्धमुनि । तू तारक भवार्णी ।
सुधारस आमुचे श्रवणी । पूर्ण केला दातारा ॥
॥२॥
गुरुचरित्र कामधेनु । ऐकता न-धाये माझे मन ।
कांक्षीत होते अंतःकरण । कथामृत ऐकावया ॥
॥३॥
ध्यान लागले श्रीगुरुचरणी । तृप्ति नव्हे अंतःकरणी ।
कथामृत संजीवनी । आणिक निरोपावे दातारा ॥
॥४॥
येणेपरी सिद्धासी । विनवी शिष्य भक्तीसी ।
माथा लावूनि चरणांसी । कृपा भाकी तये वेळी ॥
॥५॥
शिष्यवचन ऐकोनि । संतोषला सिद्धमुनि ।
सांगतसे विस्तारोनि । ऐका श्रोते एकचित्ते ॥
॥६॥
ऐक शिष्या शिकामणी । धन्य धन्य तुझी वाणी ।
तुझी भक्ति श्रीगुरुचरणी । तल्लीन झाली परियेसा ॥
॥७॥
तुजकरिता आम्हांसी । चेतन जाहले परियेसीं ।
गुरुचरित्र आद्यंतेसी । स्मरण जाहले अवधारी ॥
॥८॥
भिल्लवडी स्थानमहिमा । निरोपिला अनुपमा ।
पुढील चरित्र उत्तमा । सांगेन ऐका एकचित्तें ॥
॥९॥
क्वचित्काळ तये स्थानी । श्रीगुरु होते गौप्येनि ।
प्रकट जहाले म्हणोनि । पुढे निघाले परियेसा ॥
॥१०॥
वरुणासंगम असे ख्यात । दक्षिणवाराणसी म्हणत ।
श्रीगुरु आले अवलोकित । भक्तानुग्रह करावया ॥
॥११॥
पुढें कृष्णातटाकांत । श्रीगुरू तीर्थे पावन करीत ।
पंचगंगगासंगम ख्यात । तेथें राहिले द्वादशाब्दे ॥
॥१२॥
अनुपम्य तीर्थ मनोहर । जैसें अविमुक्त काशीपुर ।
प्रयागसमान तीर्थ थोर । म्हणोनि राहिले परियेसा ॥
॥१३॥
कुरवपुर ग्राम गहन । कुरूक्षेत्र तोंचि जाण ।
पंचगंगासंगम कृष्णा । अत्योत्त्म परियेसा ॥
॥१४॥
कुरुक्षेत्रीं जितके पुण्य । तयाहूनि अधिक असे जाण ।
तीर्थे अस्ती अगण्य़ । म्हणोनि राहिले श्रीगुरू ॥
॥१५॥
पंचगंगानदीतीर । प्रख्यात असे पुराणांतर ।
पांच नामे आहेति थोर । सांगेन ऐका एकचित्तें ॥
॥१६॥
शिवा भद्रा भोगावती । कुंभीनदी सरस्वती ।
‘पंचगंगा’ ऐसी ख्याति । महापातक संहारी ॥
॥१७॥
ऐसी प्रख्यात पंचगंगा । आली कृष्णेचिया संगा ।
प्रयागाहूनि असे चांगा । संगमस्थान मनोहर ॥
॥१८॥
अमरापुर म्हणिजे ग्राम । स्थान असे अनुपम्य ।
जैसा प्रयागसंगम । तैसे स्थान मनोहर ॥
॥१९॥
वृक्ष असे औदुंबर । प्रत्यक्ष जाणा कल्पतरु ।
देव असे अमरेश्वर । तया संगमा षटकूळी ॥
॥२०॥
जैसी वाराणसी पुरी । गंगाभागीरथी-तीरी ।
पंचनदींसंगम थोरी । तत्समान परियेसा ॥
॥२१॥
अमरेश्वरसंनिधानी । आहेति चौसष्ट योगिनी ।
शक्तितीर्थ निर्गुणी । प्रख्यात असे परियेसा ॥
॥२२॥
अमरेश्वरलिंग बरवे । त्यासी वंदुनि स्वभावे ।
पुजितां नर अमर होय । विश्वनाथ तोचि जाणा ॥
॥२३॥
प्रयागी करितां माघस्नान । जें पुण्य होय साधन ।
शतगुण होय तयाहून । एक स्नाने परियेसा ॥
॥२४॥
सहज नदीसंगमांत । प्रयागसमान असे ख्यात ।
अमरेश्वर परब्रह्म वस्तु । तया स्थानी वास असे ॥
॥२५॥
याकारणें तिये स्थानी । कोटितीर्थे असती निर्गुणी ।
वाहे गंगो दक्षिणी । वेणीसहित निरंतर ॥
॥२६॥
अमित तीर्थे तया स्थानी । सांगता विस्तार पुराणीं ।
अष्टतीर्थ ख्याति जीण । तया कृष्णातटाकांत ॥
॥२७॥
उत्तर दिशी असे देखा वहे कृष्णा पश्चिममुखा ।
‘शुक्लतीर्थ’ नाम ऐका । ब्रहम्हत्यापाप दूर ॥
॥२८॥
औदुंबर सन्मुखेसी । तीनी तीर्थे परियेसी ।
एकानंतर एक धनुषी । तीर्थे असती मनोहर ॥
॥२९॥
‘पापविनाशी’ ‘काम्यतीर्थ’ । तिसरें सिध्द ‘वरदतीर्थ ।
अमरेश्वरसंनिधार्थ । अनुपम्य असे भूमंडळी ॥
॥३०॥
पुढें संगम-षट्कुळांत । प्रयागतीर्थ असे ख्यात ।
‘शाक्तितीर्थ’ अमरतीर्थ’ । कोटितीर्थ’ परियेसा ॥
॥३१॥
तीर्थे असती अपरांपर । सांगता असे विस्तार ।
याकारणें श्रीपादगुरु । राहिले तेथें द्वादशाब्दें ॥
॥३२॥
कृष्णा वेणी नदी दोनी । पंचगंगा मिळोनी ।
सप्तनदीसंगम सगुणी । काय सांगू महिमा त्याची ॥
॥३३॥
ब्रह्महत्यादि महापातकें । जळोनि जातीं स्नानें एकें ।
ऐसें सिध्द्स्थान निकें । सकळाभीष्ट होय तेथें ॥
॥३४॥
काय सांगूं त्यांची महिमा । आणिक द्यावया नाहीं उपमा ।
दर्शनमातें होती काम्या । स्नानफळ काय वर्णू ॥
॥३५॥
साक्षात् कल्पतरु । असे वृक्ष औदुबरु ।
गौप्य होऊन अगोचरु । राहिले श्रीगुरु तया स्थानी ॥
॥३६॥
भक्तजनतारणार्थ । होणार असे ख्यात ।
राहिले तेथें श्रीगुरुनाथ । म्हणोनि प्रकट जाहले जाणा ॥
॥३७॥
असता पुढें वर्तमानीं । भिक्षा करावया प्रतिदिनीं ।
अमरापुर ग्रामी । जाती श्रीगुरु परियेसा ॥
॥३८॥
तया ग्रामी द्विज एक । असे वेदभ्यासक ।
त्याची भार्या पतिसेवक । पतिव्रतशिरोमणी ॥
॥३९॥
सुक्षीण असे तो ब्राह्मण । शुक्लभिक्षा करी आपण ।
कर्ममार्गी आचरण । असे सात्विक वृत्तीनें ॥
॥४०॥
तया विप्रमंदिरांत । असे वेल उन्नत ।
शेंगा निघती नित्य बहुत । त्याणे उदरपूर्ति करी ॥
॥४१॥
एखादे दिवशी त्या ब्राह्मणासी । वरो न मिळे परियेसीं ।
तया शेंगांते रांधोनि हर्षी । दिवस क्रमी येणेंपरी ॥
॥४२॥
ऐसा तो ब्राह्मण दरिद्री । याचकारणें उदर भरी ।
पंचमहायज्ञ कुसरी । अतिथि पूजी भक्तीनें ॥
॥४३॥
वर्तता श्रीगुरु एके दिवसीं । तया विप्रमंदिरासी ।
गेले आपण भिक्षेसी । नेलें विप्रे भक्तिनें ॥
॥४४॥
भक्तिपूर्वक श्रीगुरूसी । पूजा करी तो षोडशी ।
घेवडे-शेंगा बहुवसी । केली होती पत्र-शाका ॥
॥४५॥
भिक्षा करून ब्राह्मणासी । आश्वासिती गुरु संतोषी ।
गेलें तुझे दरिद्र दोषी । म्हणोनी निघती तये वेळी ॥
॥४६॥
तया विप्राचे गृहांत । जो का होता वेल उन्नत ।
घेवडा नाम विख्यात । आंगण सर्व वेष्टिलें असे ॥
॥४७॥
तया वेलाचें झाडमूळ श्रीगुरुमूर्ति छेदिती तात्काळ ।
टाकोनि देती परिबळें । गेले आपण संगमासी ॥
॥४८॥
विप्रवनिता तये वेळी । दु:ख करिती पुत्र सकळी ।
म्हणती पहा हो दैव बळी । कैसें अदृष्ट आपुलें ॥
॥४९॥
आम्हीं तया यतीश्वरासी । काय उपद्रव केला त्यासी ।
आमुचा ग्रास छेदुनी कैसी । टाकोनि दिल्हा भूमीवरी ॥
॥५०॥
ऐसेपरी ते नारी । दु:ख करी नानापरी ।
पुरुष तिचा कोप करी । म्हणे प्रारब्ध प्रमाण ॥
॥५१॥
म्हणे स्त्रियेसी तये वेळी । जें जें होणार जया काळी ।
निर्माण करी चंद्रमोळी । तया आधीन । विश्व जाण ॥
॥५२॥
विश्वव्यापक नारायण । उत्पत्तिस्थितिलया कारण ।
पिपीलिकादि स्थूळ-जीवन । समस्तां आहार पुरवीतसे ॥
॥५३॥
‘आयुरन्नं प्रयच्छति’ । ऐसें बोले वेदश्रुति ।
पंचानन आहार हस्ती । केवी करी प्रत्यही ॥
॥५४॥
चौर्यायशी लक्ष जीवराशी । स्थूल सूक्ष्म समस्तांसी ।
निर्माण केलें आहारासी । मग उत्पत्ति तदनंतरें ॥
॥५५॥
रंकरायासी एक दृष्टी । करुनि निक्षेपण ।
सकृत अथवा दुष्कृत्य जाण । आपुलें आपणचि भोगणें । पुढील्यावरी काय बोल ॥
॥५६॥
आपुलें दैव असतां उणें । पुढिल्या बोलती मूर्खपणे ।
जे पेरिलें तोंचि भक्षणें । कवणावरी बोल सांगे ॥
॥५७॥
बोल ठेविसी यतीश्वरासी । आपलें आर्जव न विचारिसी ।
ग्रास हरितला म्हणसी । अविद्यासागरी बुडोनि ॥
॥५८॥
तो तारक आम्हांसी । म्हणोनि आला भिक्षेसी ।
नेलें आमुचे दरिद्रदोषी । तोचि तारील आमुतें ॥
॥५९॥
येणेंपरी स्त्रियेसी । संभाषी विप्र परियेसी ।
काढोनि वेलशाखेसी । टाकीता झाला गंगेत ॥
॥६०॥
तया वेलाचें मूळ थोरी । जे कां होतें आपुले द्वारी ।
काढूं म्हणुनि द्विजवरी । खणिता झाला तया वेळीं ॥
॥६१॥
काढितां वेलमूळासी । लाधला कुंभे निधानेसी ।
आनंद जाहला बहुवसी । घेऊनि गेला घरांत ॥
॥६२॥
म्हणती नवल काय वर्तले । यतीश्वर आम्हां प्रसन्न्न झाले ।
म्हणोनि ह्या वेला छेदिलें । निधान लाधलें आम्हांसी ॥
॥६३॥
नर नव्हे तो योगीश्वर होईल ईश्वरीअवतार ।
आम्हां भेटला दैन्यहर । म्हणती चला दर्शनासी ॥
॥६४॥
जाऊनि संगमा श्रीगुरुसी । पूजा करिती बहुवसी ।
वृत्तांत सांगती तयासी । तये वेळी परियेसा ॥
॥६५॥
श्रीगुरु म्हणती तयासी । तुम्ही न सांगणें कवणासी ।
प्रकट करितां आम्हांसी । नसेल लक्ष्मी तुमचे घरी ॥
॥६६॥
ऐसेपरी तया द्विजासी । सांगे श्रीगुरु परियेसी ।
अखंड लक्ष्मी तुमचे वंशी । पुत्रपौत्री नांदाल ॥
॥६७॥
ऐसा वर लधोन । गेली वनिता तो ब्राह्मण ।
श्रीगुरुकृपा ऐसी जाण । दर्शनमात्रे दैन्य हरे ॥
॥६८॥
ज्यासी होय श्रीगुरुकृपा । त्यासी कैचें दैन्य पाप ।
कल्पवृक्ष-आश्रय करितां बापा । दैन्य कैंचे तया घरी ॥
॥६९॥
दैव उणा असेल जो नरु । त्याणें आश्रयावा श्रीगुरु ।
तोचि उतरेल पैलपारु । पूज्य होय सकळिकांई ॥
॥७०॥
जो कोण भजेल श्रीगुरु । त्यासी लाधेल इह-परु ।
अखंड लक्ष्मी त्याचे घरी । अष्टैश्वर्ये नांदती ॥
॥७१॥
सिध्द म्हणे नामधारकासी । श्रीगुरुमहिमा असे ऐसी ।
भजावे तुम्हीं मनोमानसीं । कामधेनु तुझ्या घरीं ॥
॥७२॥
गंगाधराचा कुमर । सांगे श्रीगुरुचरित्रविस्तार ।
पुढील कथामृतसार । ऐका श्रोते एकचित्तें ॥
॥७३॥
इति श्रीगुरुचरित्रामृते परमकथाकल्पतरौ श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिध्द-नामधारकसंवादे अमरापुरमहिमानं-द्विजदैन्यहरणं नाम अष्टादशोऽध्याय: ॥ १८ ॥
॥ श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु ॥
॥ श्रीगुरुदेवदत्त ॥
Source:
https://gurusiyag.org/gurucharitra_adhyay_18/

0 comments:
Post a Comment